महाभारत 7.84.27
जनाश्च तद्ददृशिरे रक्षः कौतूहलान्विताःयदृच्छया निपतितं भूमावङ्गारकं यथा
janāśca taddadṛśire rakṣaḥ kautūhalānvitāḥyadṛcchayā nipatitaṃ bhūmāvaṅgārakaṃ yathā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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