महाभारत 7.86.16
जयद्रथमहं हत्वा ध्रुवमेष्यामि माधवधर्मराजं यथा द्रोणो निगृह्णीयाद्रणे बलात्
jayadrathamahaṃ hatvā dhruvameṣyāmi mādhavadharmarājaṃ yathā droṇo nigṛhṇīyādraṇe balāt
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें