महाभारत 7.86.42
स त्वमातिष्ठ यानाय यत्र यातो धनंजयःममापि रक्षणं भीमः करिष्यति महाबलः
sa tvamātiṣṭha yānāya yatra yāto dhanaṃjayaḥmamāpi rakṣaṇaṃ bhīmaḥ kariṣyati mahābalaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें