महाभारत 7.87.5
न हि मे पाण्डवात्कश्चित्त्रिषु लोकेषु विद्यतेयो वै प्रियतरो राजन्सत्यमेतद्ब्रवीमि ते
na hi me pāṇḍavātkaścittriṣu lokeṣu vidyateyo vai priyataro rājansatyametadbravīmi te
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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