महाभारत 7.87.7
यथा हि मे गुरोर्वाक्यं विशिष्टं द्विपदां वरतथा तवापि वचनं विशिष्टतरमेव मे
yathā hi me gurorvākyaṃ viśiṣṭaṃ dvipadāṃ varatathā tavāpi vacanaṃ viśiṣṭatarameva me
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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