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महाभारत 7.89.32
विद्रुतान्रथिनो दृष्ट्वा निरुत्साहान्द्विषज्जयेपलायने कृतोत्साहान्मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः
vidrutānrathino dṛṣṭvā nirutsāhāndviṣajjayepalāyane kṛtotsāhānmanye śocanti putrakāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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