महाभारत 7.90.30भ्रामयित्वा महाचर्म चामीकरविभूषितम्तमसिं प्रेषयामास कृतवर्मरथं प्रतिbhrāmayitvā mahācarma cāmīkaravibhūṣitamtamasiṃ preṣayāmāsa kṛtavarmarathaṃ pratiइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें