महाभारत 7.92.34
ततोऽशीतिं शिनेः पौत्रः सायकान्कृतवर्मणेप्राहिणोत्त्वरया युक्तो द्रष्टुकामो धनंजयम्
tato'śītiṃ śineḥ pautraḥ sāyakānkṛtavarmaṇeprāhiṇottvarayā yukto draṣṭukāmo dhanaṃjayam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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