महाभारत 7.92.39
संजातरुधिरश्चाजौ सात्वतेषुभिरर्दितःप्रचलन्धनुरुत्सृज्य न्यपतत्स्यन्दनोत्तमे
saṃjātarudhiraścājau sātvateṣubhirarditaḥpracalandhanurutsṛjya nyapatatsyandanottame
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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