महाभारत 7.95.34
रुक्मपुङ्खैः सुनिशितैर्गार्ध्रपत्रैरजिह्मगैःउच्चकर्त शिरांस्युग्रो यवनानां भुजानपि
rukmapuṅkhaiḥ suniśitairgārdhrapatrairajihmagaiḥuccakarta śirāṃsyugro yavanānāṃ bhujānapi
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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