महाभारत 7.95.39
अगम्यरूपां पृथिवीं मांसशोणितकर्दमाम्कृतवांस्तत्र शैनेयः क्षपयंस्तावकं बलम्
agamyarūpāṃ pṛthivīṃ māṃsaśoṇitakardamāmkṛtavāṃstatra śaineyaḥ kṣapayaṃstāvakaṃ balam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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