महाभारत 7.95.42
वज्राशनिसमस्पर्शैः सुपर्वभिरजिह्मगैःते साश्वयाना निहताः समावव्रुर्वसुंधराम्
vajrāśanisamasparśaiḥ suparvabhirajihmagaiḥte sāśvayānā nihatāḥ samāvavrurvasuṃdharām
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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