महाभारत 7.95.4
तीर्णाः स्म दुस्तरं तात द्रोणानीकमहार्णवम्जलसंधबलेनाजौ पुरुषादैरिवावृतम्
tīrṇāḥ sma dustaraṃ tāta droṇānīkamahārṇavamjalasaṃdhabalenājau puruṣādairivāvṛtam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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