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महाभारत 7.96.38
दुर्योधनस्त्रिसप्तत्या विद्ध्वा भारत माधवम्ततोऽस्य निशितैर्बाणैस्त्रिभिर्विव्याध सारथिम्
duryodhanastrisaptatyā viddhvā bhārata mādhavamtato'sya niśitairbāṇaistribhirvivyādha sārathim
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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