महाभारत 8.1.44
दुर्योधनस्य कर्णस्य भोजस्य कृतवर्मणःमद्रराजस्य शल्यस्य द्रौणेश्चैव कृपस्य च
duryodhanasya karṇasya bhojasya kṛtavarmaṇaḥmadrarājasya śalyasya drauṇeścaiva kṛpasya ca
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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