महाभारत 8.10.32
सृजन्तो विविधान्बाणाञ्शतघ्नीश्च सकिङ्किणीःत एनं छादयामासुः सूर्यमभ्रगणा इव
sṛjanto vividhānbāṇāñśataghnīśca sakiṅkiṇīḥta enaṃ chādayāmāsuḥ sūryamabhragaṇā iva
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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