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महाभारत 8.13.14
स पार्थबाणैस्तपनीयभूषणैः; समारुचत्काञ्चनवर्मभृद्द्विपःतथा चकाशे निशि पर्वतो यथा; दवाग्निना प्रज्वलितौषधिद्रुमः
sa pārthabāṇaistapanīyabhūṣaṇaiḥ; samārucatkāñcanavarmabhṛddvipaḥtathā cakāśe niśi parvato yathā; davāgninā prajvalitauṣadhidrumaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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