महाभारत 8.15.31
द्रौणिपर्जन्यमुक्तां तां बाणवृष्टिं सुदुःसहाम्वायव्यास्त्रेण स क्षिप्रं रुद्ध्वा पाण्ड्यानिलोऽनदत्
drauṇiparjanyamuktāṃ tāṃ bāṇavṛṣṭiṃ suduḥsahāmvāyavyāstreṇa sa kṣipraṃ ruddhvā pāṇḍyānilo'nadat
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें