महाभारत 8.18.75
अपोवाह रणात्तं तु सारथी रथिनां वरम्हार्दिक्यशरसंतप्तं निःश्वसन्तं पुनः पुनः
apovāha raṇāttaṃ tu sārathī rathināṃ varamhārdikyaśarasaṃtaptaṃ niḥśvasantaṃ punaḥ punaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें