महाभारत 8.19.16
विष्वक्सेनं तु निर्भिन्नं प्रेक्ष्य पार्थो धनंजयःसत्यसेनं शरैस्तीक्ष्णैर्दारयित्वा महाबलः
viṣvaksenaṃ tu nirbhinnaṃ prekṣya pārtho dhanaṃjayaḥsatyasenaṃ śaraistīkṣṇairdārayitvā mahābalaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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