महाभारत 8.19.55
पदातीनां तु सहसा प्रद्रुतानां महामृधेउत्सृज्याभरणं तूर्णमवप्लुत्य रणाजिरे
padātīnāṃ tu sahasā pradrutānāṃ mahāmṛdheutsṛjyābharaṇaṃ tūrṇamavaplutya raṇājire
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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