महाभारत 8.24.69
मन्दरं पर्वतं चाक्षं जङ्घास्तस्य महानदीःदिशश्च प्रदिशश्चैव परिवारं रथस्य हि
mandaraṃ parvataṃ cākṣaṃ jaṅghāstasya mahānadīḥdiśaśca pradiśaścaiva parivāraṃ rathasya hi
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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