महाभारत 8.24.71
सूर्याचन्द्रमसौ कृत्वा चक्रे रथवरोत्तमेपक्षौ पूर्वापरौ तत्र कृते रात्र्यहनी शुभे
sūryācandramasau kṛtvā cakre rathavarottamepakṣau pūrvāparau tatra kṛte rātryahanī śubhe
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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