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महाभारत 8.30.42
युगंधरे पयः पीत्वा प्रोष्य चाप्यच्युतस्थलेतद्वद्भूतिलये स्नात्वा कथं स्वर्गं गमिष्यति
yugaṃdhare payaḥ pītvā proṣya cāpyacyutasthaletadvadbhūtilaye snātvā kathaṃ svargaṃ gamiṣyati
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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