महाभारत 8.30.80
सर्वज्ञा यवना राजञ्शूराश्चैव विशेषतःम्लेच्छाः स्वसंज्ञानियता नानुक्त इतरो जनः
sarvajñā yavanā rājañśūrāścaiva viśeṣataḥmlecchāḥ svasaṃjñāniyatā nānukta itaro janaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें