महाभारत 8.32.61
अथान्यद्धनुरादाय सुषेणः क्रोधमूर्छितःअविध्यन्नकुलं षष्ट्या सहदेवं च सप्तभिः
athānyaddhanurādāya suṣeṇaḥ krodhamūrchitaḥavidhyannakulaṃ ṣaṣṭyā sahadevaṃ ca saptabhiḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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