Loading
महाभारत 8.33.35
एवं पार्थो व्यपायात्स निहतप्रार्ष्टिसारथिःअशक्नुवन्प्रमुखतः स्थातुं कर्णस्य दुर्मनाः
evaṃ pārtho vyapāyātsa nihataprārṣṭisārathiḥaśaknuvanpramukhataḥ sthātuṃ karṇasya durmanāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें