महाभारत 8.35.27
ततस्ते प्राद्रवन्भीताः प्रतीपं प्रहिताः पुनःमहामात्रैस्तमावव्रुर्मेघा इव दिवाकरम्
tataste prādravanbhītāḥ pratīpaṃ prahitāḥ punaḥmahāmātraistamāvavrurmeghā iva divākaram
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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