महाभारत 8.35.39
कर्णोऽपि समरे राजन्धर्मपुत्रमरिंदमम्शरैः प्रच्छादयामास सारथिं चाप्यपातयत्
karṇo'pi samare rājandharmaputramariṃdamamśaraiḥ pracchādayāmāsa sārathiṃ cāpyapātayat
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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