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महाभारत 8.35.40
ततः संप्रद्रुतं संख्ये रथं दृष्ट्वा महारथःअन्वधावत्किरन्बाणैः कङ्कपत्रैरजिह्मगैः
tataḥ saṃpradrutaṃ saṃkhye rathaṃ dṛṣṭvā mahārathaḥanvadhāvatkiranbāṇaiḥ kaṅkapatrairajihmagaiḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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