महाभारत 8.35.53
आसीन्निनादः सुमहान्बलौघानां परस्परम्गर्जतां सागरौघाणां यथा स्यान्निस्वनो महान्
āsīnninādaḥ sumahānbalaughānāṃ parasparamgarjatāṃ sāgaraughāṇāṃ yathā syānnisvano mahān
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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