महाभारत 8.37.35
अयुतं तत्र योधानां हत्वा पाण्डुसुतो रणेव्यभ्राजत रणे राजन्विधूमोऽग्निरिव ज्वलन्
ayutaṃ tatra yodhānāṃ hatvā pāṇḍusuto raṇevyabhrājata raṇe rājanvidhūmo'gniriva jvalan
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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