महाभारत 8.38.26
गौतमस्तु ततः क्रुद्धो धनुर्गृह्य नवं दृढम्सुकेतुं त्रिंशता बाणैः सर्वमर्मस्वताडयत्
gautamastu tataḥ kruddho dhanurgṛhya navaṃ dṛḍhamsuketuṃ triṃśatā bāṇaiḥ sarvamarmasvatāḍayat
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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