महाभारत 8.38.7
ततः शिखण्डी कुपीतः शरैः सप्तभिराहवेकृपं विव्याध सुभृशं कङ्कपत्रैरजिह्मगैः
tataḥ śikhaṇḍī kupītaḥ śaraiḥ saptabhirāhavekṛpaṃ vivyādha subhṛśaṃ kaṅkapatrairajihmagaiḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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