महाभारत 8.39.4
द्रौणायनिशरच्छन्नं न प्राज्ञायत किंचनबाणभूतमभूत्सर्वमायोधनशिरो हि तत्
drauṇāyaniśaracchannaṃ na prājñāyata kiṃcanabāṇabhūtamabhūtsarvamāyodhanaśiro hi tat
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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