महाभारत 8.40.27
स पञ्चदश नाराचाञ्श्वसतः पन्नगानिवजिघांसुर्भरतश्रेष्ठं धृष्टद्युम्नो व्यवासृजत्
sa pañcadaśa nārācāñśvasataḥ pannagānivajighāṃsurbharataśreṣṭhaṃ dhṛṣṭadyumno vyavāsṛjat
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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