महाभारत 8.40.5
संशप्तकेषु पार्थश्च कौरवेषु वृकोदरःपाञ्चालेषु तथा कर्णः क्षयं चक्रूर्महारथाः
saṃśaptakeṣu pārthaśca kauraveṣu vṛkodaraḥpāñcāleṣu tathā karṇaḥ kṣayaṃ cakrūrmahārathāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें