महाभारत 8.42.55
वादित्राणि च दिव्यानि प्रावाद्यन्त सहस्रशःसिंहनादश्च संजज्ञे दृष्ट्वा घोरं महाद्भुतम्
vāditrāṇi ca divyāni prāvādyanta sahasraśaḥsiṃhanādaśca saṃjajñe dṛṣṭvā ghoraṃ mahādbhutam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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