महाभारत 8.42.5
आगच्छमानांस्तान्संख्ये प्रहृष्टान्विजयैषिणःदधारैको रणे कर्णो जलौघानिव पर्वतः
āgacchamānāṃstānsaṃkhye prahṛṣṭānvijayaiṣiṇaḥdadhāraiko raṇe karṇo jalaughāniva parvataḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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