महाभारत 8.44.23
कर्णचापच्युतान्बाणान्वर्जयंस्तु नरोत्तमःअपयातस्ततस्तूर्णं शिखण्डी जयतां वरः
karṇacāpacyutānbāṇānvarjayaṃstu narottamaḥapayātastatastūrṇaṃ śikhaṇḍī jayatāṃ varaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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