महाभारत 8.44.35
नकुलस्तु ततः क्रुद्धो वृषसेनं स्मयन्निवनाराचेन सुतीक्ष्णेन विव्याध हृदये दृढम्
nakulastu tataḥ kruddho vṛṣasenaṃ smayannivanārācena sutīkṣṇena vivyādha hṛdaye dṛḍham
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें