महाभारत 8.44.52
उत्तमौजास्तु हार्दिक्यं शरैर्भीमपराक्रमम्छादयामास सहसा मेघो वृष्ट्या यथाचलम्
uttamaujāstu hārdikyaṃ śarairbhīmaparākramamchādayāmāsa sahasā megho vṛṣṭyā yathācalam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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