महाभारत 8.45.38
निपतद्भिर्गजै राजन्नरैश्चापि सहस्रशःरथैश्चापि नरव्याघ्र हयैश्चापि समन्ततः
nipatadbhirgajai rājannaraiścāpi sahasraśaḥrathaiścāpi naravyāghra hayaiścāpi samantataḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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