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महाभारत 8.45.48
सुतीक्ष्णं चोदयन्नश्वान्प्रेक्षते मां मुहुर्मुहुःन च पश्यामि समरे कर्णस्य प्रपलायितम्
sutīkṣṇaṃ codayannaśvānprekṣate māṃ muhurmuhuḥna ca paśyāmi samare karṇasya prapalāyitam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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