महाभारत 8.49.115
भवन्तं नाथमासाद्य आवां व्यसनसागरात्घोरादद्य समुत्तीर्णावुभावज्ञानमोहितौ
bhavantaṃ nāthamāsādya āvāṃ vyasanasāgarātghorādadya samuttīrṇāvubhāvajñānamohitau
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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