महाभारत 8.49.17
अनिश्चयज्ञो हि नरः कार्याकार्यविनिश्चयेअवशो मुह्यते पार्थ यथा त्वं मूढ एव तु
aniścayajño hi naraḥ kāryākāryaviniścayeavaśo muhyate pārtha yathā tvaṃ mūḍha eva tu
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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