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महाभारत 8.49.71
भ्राता प्राज्ञस्तव कोपं न जातु; कुर्याद्राजा कंचन पाण्डवेयःमुक्तोऽनृताद्भ्रातृवधाच्च पार्थ; हृष्टः कर्णं त्वं जहि सूतपुत्रम्
bhrātā prājñastava kopaṃ na jātu; kuryādrājā kaṃcana pāṇḍaveyaḥmukto'nṛtādbhrātṛvadhācca pārtha; hṛṣṭaḥ karṇaṃ tvaṃ jahi sūtaputram
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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