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महाभारत 8.49.77
महाबलो वैश्रवणान्तकोपमः; प्रसह्य हन्ता द्विषतां यथार्हम्स भीमसेनोऽर्हति गर्हणां मे; न त्वं नित्यं रक्ष्यसे यः सुहृद्भिः
mahābalo vaiśravaṇāntakopamaḥ; prasahya hantā dviṣatāṃ yathārhamsa bhīmaseno'rhati garhaṇāṃ me; na tvaṃ nityaṃ rakṣyase yaḥ suhṛdbhiḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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