महाभारत 8.49.8
एवमुक्तस्तु कृष्णेन प्रेक्षमाणो युधिष्ठिरम्अर्जुनः प्राह गोविन्दं क्रुद्धः सर्प इव श्वसन्
evamuktastu kṛṣṇena prekṣamāṇo yudhiṣṭhiramarjunaḥ prāha govindaṃ kruddhaḥ sarpa iva śvasan
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें