महाभारत 8.5.12यस्य ज्यातलशब्देन शरवृष्टिरवेण चरथाश्वनरमातङ्गा नावतिष्ठन्ति संयुगेyasya jyātalaśabdena śaravṛṣṭiraveṇa carathāśvanaramātaṅgā nāvatiṣṭhanti saṃyugeइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें